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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मंजिल

हंस राज ठाकुर

मैं वो हूँ जो खुद नहीं जानता कि मेरे मन के अंदर क्या है अस्त व्यस्त जिंदगी,कोई ठहराव नहीं कोई मंजिल नहीं I मंजिल मंजिल करते करते,यूं ही जिंदगी कट गई , मगर मंजिल नहीं मिली और ये उम्र गुजर गई .....मंजिल मंजिल -I आशाओं के दीप जलाये मैंने तूफानी रातों में , बच न सके वो भी तो यारो ,इस दुनिया की महफूज दीवारों में, मंजिल मंजिल करते करते,यूं ही जिंदगी कट गई , मगर मंजिल नहीं मिली और ये उम्र गुजर गई ... मंजिल मंजिल II ठोकरें खाकर नशा है इतना, नहीं है चाह अब पीने की, दुनिया की खुदगर्जी ने हमको, सिखला दी है रह जीने की , मंजिल मंजिल करते करते,यूं ही जिंदगी कट गई , मगर मंजिल नहीं मिली और ये उम्र गुजर गई ... मंजिल मंजिल -III आशा निराशा के सागर में डूबा, में इक अनजाना राही , हमसफ़र भी तो कोई नहीं है,न ही कोई है मंजिल, मंजिल मंजिल करते करते,यूं ही जिंदगी कट गई , मगर मंजिल नहीं मिली और ये उम्र गुजर गई .....मंजिल मंजिल -IV गैरों से क्या शिकवा करते, धोखे दिए जो अपनों ने , मरहम से जो भर न पाए, ये दर्द है नासूर जख्मों के , मंजिल मंजिल करते करते,यूं ही जिंदगी कट गई , मगर मंजिल नहीं मिली और ये उम्र गुजर गई .....मंजिल मंजिल -V


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