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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

शादी की 10वीं सालगिरह पर जीवनसाथी को समर्पित ..
"तेरे बिन..."

डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'

तुम से हम, हम से तुम कुछ , इस तरह तुम घुलमिल गए। जाने कब यूं ही गए दिन, दशक दिन है हो गए। चंद मुलाकातों में सब , बेगानगी जाती रही। दिल लगाते ही हुए रुख्शत, करार ओ सब्र होश। जो मयस्सर थी कभी वो, सादगी अब जाती रही। तेरे जलवों में भी हम कुछ, खो गए होशो हवास। इश्क में फिक्र ए सुबह ओ, शाम भी जाती रही। तुम चले आये तो सारी, बेकली जाती रही। जिंदगी में थी कमी जो, वो कमी जाती रही। ए 'समा' तेरे बिना अब, जिंदगानी कुछ भी नही। जिंदगी अब है तुझीसे, बिरानगी जाती रही।


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