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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

जुदाई

आशुतोष कुमार

हे मानव! यह सच है! एक दिन जुदा तो होना ही है शरीर को आत्मा से वही तो एक सच है बाकी सब तो मिथ्या। जुदाई शब्द का निर्माण शायद इसी बात की पुष्टि करता है हे मानव ! जानों इसको। हे मानव ! सत्य को पहचानो इस मोह के नाटक में मात्र एक पात्र हो तुम इस जीवन रूपी नैया को जितना संवार सकते ! संवारो। हे मानव ! मानव सेवा ही सच्चा कर्म इससे बड़ा न कोई धर्म परोपकार की नीति बनाओ। हे मानव ! पृथ्वी पर तुम ज्ञानी सबसे अमूल्य प्राणी सबके रक्षक तुम ही हो अपने आपको पहचानो।


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