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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

कुदरत ने कहा...

अशोक दर्द

रात नीले आसमान ने मुस्कुराकर कहा कितना निर्मल हो गया हूं मैं आदमी ने मुझे धूल धुएं से इतना कुरूप कर दिया था कि मुझसे ही मेरा असली चेहरा पहचाना नहीं जाता था । मेरी गोद में टिमटिमाते सितारे न जाने कहां खो गए थे बरसों हो गए थे इन्हें धरती को देखे हुए धुंध की बदरंग चादर इन्हें धरती को देखने ही नहीं देती थी । आज बरसों बाद इन्होंने फिर धरती को निहारा है और धरती ने मेरे आंचल में सजे संवरे चांद सितारों को दूर से ही सही आशीष दी है । मेरे विस्तृत आंचल को नीलिमा ओढ़े हुए यूं लगता है जैसे कोई नवयौवनाश्रृंगार करके बालकनी में आ खड़ी हुई हो अपने आंगन से सारा कूड़ा कचरा आज बुहारा है खुद को संवारा है निखारा है । चिड़ियों की चुलबुल बरसों से जो कोलाहल के बीच दब सी गई थी आज फिर चुलबुल से टहनियां चहकने लगी है , महकने लगी है । फिर कह रही हूं आदमी को दुनिया को जीत लेने की जिद्द का परिणाम देखा तुम ने भस्मासुर ने किस तरह नाच नचाया है । त्रासदी की यह तस्वीर सदी की कितनी भयानक तस्वीर है कितना बेबस है आदमी आज कल तक जो बात बात पर अपने शस्त्रों अस्त्रों को गिना कर डरावने सपने दिखाता था खुद कितना सहमा सहमा सा है। यह सिर्फ चेतावनी है आदमी सुन तेरे लिए संभल जाने का एक और अवसर वरना भस्मासुर पैदा करेगा तो विनाश करने के लिए वो तेरे ही पीछे दौड़ेगा जैसे आज दौड़ रहा है ।।


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