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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

कविता 'गाँव' का अगला भाग

अरुण कुमार प्रसाद

भोज है परम्परा आयोजन करना ही है । बरस भर का अनाज निकाल धरना ही है । भोज के बाद भोजों की अन्तहीन प्रतीक्षा । भाग का भोग कहते और कहते परीक्षा । सुबह, शाम अन्न –दर्शन को ललचाते लोग । नाक बची रहे ऊँची रहे, है कैसा ये सोच । होते-होते यही आंख आकाश पर । टँग है जाती यूँ ! इतना है अवकाश भर। खोजते फिरते बादल के टुकड़े फिर ये । बात बादल, फसल, नक्षत्र, वर्षा की ये । बीज,बैलों के ये हल के फावड़े, कुदाल के । और सचमुच हैं जीवट ये बिलकुल कमाल के । किसी दिन इन दिनों जो बादल दिखाई दे तो । बाँसों उछलते तन-मन यदि गहरा दिखाई दे तो । पहली जो गिरती बूंदें, ये पूजते हैं इनको। ईश्वर, प्रभु या देवा ये बूंद ही है इनको। बारिश हुई तो इनकी दुनिया निहाल होती । बारिश नहीं जो होती दुनिया बेहाल होती। जुटते हैं खेत में फिर बैलों के साथ हिलमिल। जुटते हैं जैसे बैलें हल के जुओं से घुलमिल। गाँवों के अर्थतन्त्र के, बैलें हैं जैसे रीढ़ । इनसे जुड़ा है इनका तदबीर व तकदीर। गहने हैं गिरवी रखते,घर–द्वार गिरवी रखते। बीजों के हेतु, न हो हल-फाल गिरवी रखते। मालिक के घर का सुबह-शाम करते दर्शन। ‘दाता तुम्हीं हो मालिक’ कर जोड़ करते पूजन। दुगने की शर्त पर फिर, बीजों की बोरी खुलती। इनकी विवशता इनके अंदर ही खुलती,घुलती। किसको कहें की ये तो अन्याय है सरासर। जो भी समर्थ बनते करते हैं यूँ सरासर। उगते, अंकुरते पौधे, खेतों में धीरे-धीरे। जाता अषाढ़, आता सावन है ऑंखें मींचे। सोयी हुई ये बस्ती तब व्यस्त हो है जाती। पत्थर, पहाड़ को भी चीखों से है जगाती। सावन व भादो बरसे तो भाग्य इनके बरसे। सूखे गुजर गये तो दाने को भी ये तरसे। जैसे निचोड़ करके लहू के हरेक कतरे। खेतों में डाल करके करते ये पौधे तगड़े। पौधे को पालते ये पौधों को पोसते हैं। मेड़ों को बांधते ये मेड़ों को खोलते हैं। धानों की बाली फूटे,खुशियाँ चमकती मुख पर। पकती है जैसे-जैसे, खुशियाँ उमंगती मुख पर। फिर पुआल, जाड़ा; फिर फसल की कटाई। कर्जा चुकाना पहला फिर फसल की बुआई। बदले हुए समय ने कुछ श्राप दे दिया है। जीने के लिए फिर से विलाप दे दिया है। अब गाँव में शहर पर, आने लगा है रहने। मैं शहर हूँ, शहर हूँ चिल्ला के चीख कहने। शिशु जब कदम उठाके रस्ते पे कदम रखता। तब खेत था निशाना,अब शहर की राह धरता। औचित्य ब्याह का क्या बच्चे ही पैदा करना ! बिना सोच के समझ के परंपरा पे पैर रखना। बच्चे लगे हैं बिकने बंधुआ ही बन के खपने। बचपन से बेदखल हो किसी ‘मिल’ में व सुबकने। हर जुल्म जो बचपन भोगे माँ-बाप किया करता। माँ–बाप जुर्म करते बचपन है ‘भरण’ भरता। सुविधा के गढ़ को कहते आये शहर हैं लोगो। वस्तुत: शहर तो है सभ्यता की उच्चता लोगो। जो चीख-चीख कहता मैं ही शहर हूँ सुन लो। वो तो शहर नहीं है कहता है कवि गुन लो। अच्छा है कुंभकर्णी गाँवों की नींद गुम हो । ये खुद खड़े हों इनका गंवईपना तो कम हो। बिना उम्मीद के जीते हुए मरते रहे हैं गाँव। ‘उम्मीद सिर्फ अर्थ का’ करते हैं कांव-कांव। देखोगे दोस्त गाँव में अजब-गजब करम। सभ्यता के मानवीय शास्त्र का बेहूदा शरम। जूठन में अन्न ढूंढता बचपन व बुढ़ापा। क्रांति को चाहिए था कि वह खो देता आपा। बाबजूद इसके हर धर्म जिया एक हवा में। संकट की हर घड़ी में हर कर उठा दुआ में। गाँवों को चाहिए, एक अच्छी दिशा व सोच। देश समाज गाँव बदल जायेंगे नि:संकोच। इनको अगर मिले जो अच्छी सी व्यवस्था। ये ही सुधार ले पायेंगे इनकी बुरी अवस्था। इनको नये युगों से परिचित तो कराईये । विज्ञान इनके सोच में बस डाल जाईये । ये जान पायें कि दुनिया कितनी विशाल है। और जान पायें कि युग में कितने कमाल हैं। कूप-मंडूकता इनका, इनसे है देना दूर कर। इनका विकास होगा विकसित हो मन अगर। छीन-झपट लेने को लोग बड़े उत्सुक हैं। भोलापन कर दिखा ठगने को जागरूक हैं। गाँवों में विनिमय आर्थिक है बड़ा ही अल्प। इसलिए इन्हें यहाँ है कुछ नहीं सुलभ। कैसे?सकेंगे जुड़ ये आर्थिक विकास से। होंगे प्रकाशित कैसे ये बिन प्रकाश के? आने प्रकाश दीजिये शिक्षा के रूप में। इनको उठाया जाये जरा अंध कूप से। गाँवों के आर्थिक जीवन शहरों से जोडिये। गाँवों के शैक्षिक जीवन शहरों से जोडिये । तब ही विकास होगा तब ही बढ़ सकेंगे ये। सडकों से जोड़िये तो पग-पग बढ़ सकेंगे ये। तलवार बनके सिर पर लटका हुआ है डर। सहमा हुआ यह गाँव जाये तो यह किधर। वर्चस्व जिसका वह, तो है बाघ,सिंह,सांप । जो भी उठेगा उसका अस्तित्व लेगा नाप । जब भी कभी इच्छा हुई चल देते लोग हैं। गरीबों के बहन,बेटी का वह लेते भोग हैं। कहते हैं पंच इसको,है छोटी सी एक बात। पगड़ी जो उनकी उछली तो होगा वज्रपात। सो चुप करो,हमको कहा,कहियो न किसीसे। मालिक तेरा,कुछ मांग ले देगा वह ख़ुशी से। पंचों को जुटाना ना तेरा घर उजड़ जायगा। आँधी न आये आग तो बस खा ही जायेगा। किसको सुनाये अपनी विवशता की कहानी। सो ढाँपता है विवश होके अपना वो ‘पानी’। दूसरी तरफ जो देखिये आश्चर्य! होगा जी। यूँ करना दलित कहते हैं मर्दों की निशानी। थाने को यदि जाये तो उलटता है मुकदमा। एक से अधिक की हो जाती है ‘सुम्मा’। आ गया स्वराज पर, आके स्तब्ध है। पाँव इसके ठीक हैं पर,जिस्म दग्ध है। यूँ की चुनाव आते हैं अधिकार लिए ही। बाहुबली के लोग भी अधिकार लिए ही। चाहे तो मत मुझे दो अथवा रहो तुम बंद। देखो न करो भंग भई ,शांति का सम्बन्ध। जैसे थे काल कल के वैसे ही आज हैं। इस तरह ये लोग भोगते स्वराज हैं। उनके ही पास इनका कल अर्थतन्त्र था। न आज यह स्वतंत्र है न कल स्वतंत्र था। ढोयेगा बोझ हाट तक या हल चलाएगा। ‘वह’ तय करेगा आज यह खाए,न खायेगा। इतनी बेचारगी है और अवस्था इतनी विवश। जीतेंगे ‘कृषि-रण’ को ये पर,पाएंगे वो रस। बस सम्पदा और सम्बल माटी ही इनको है। पत्ते व वृक्ष,कंद,मूल तथा गौवंश ही इनको है। पत्थर को, माता गौ को अपनी व्यथा सुनाते। कातर नयन से नभ को अपनी कथा सुनाते। जो है जीविका के साधन वह खेत पड़ा बंधक। अस्तित्व खड़ा ताके और देह क्षुधा से धक-धक।

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