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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

बँटवारे की दहलीज

अनिल कुमार

एक दहलीज के दो दरवाजे एक समय एक ही घर में थे जाते अलग-अलग दो पाटों में भी दो दरवाजे एक ही घर की एक ही दहलीज थे बनाते कई दिनों तक साथ-साथ थे दो पाटों में खुलते मिलकर हाथ से हाथ मिलाते बँटवारे की चौकट पर एक ही घर के है दो हिस्से आधे-आधे एक दहलीज के दो दरवाजे दो हिस्सों में खुलते अब दो घर को है जाते...।


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