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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

खामोश मोहब्बत

रश्मि सिंह

आज लगभग17 वर्षो के बाद हम मिले फिर से अजनबी बन कर। दोनों के बिच फैली ख़ामोशी और शिकायतों का सिलसिला जो शुरू हुआ मानो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था ।दोनों एक दूसरे में इस कदर खोए थे मानो उनके अलावा कोई भी न हो आस-पास आज दोनों अपनी ज़िंदगी में खुश नहीं। मैंने आज जीत से बस एक शिकायत की "क्यों तुम मुझे छोड गए थे"बोलो "बिना बताये क्यू गये थे तुम जीत"

जीत खामोश बिना कुछ बोले उसने मुझे जोर से अपनी बाँहों में कैद कर लिया और बोला बस अब कोई सवाल न करो मैंने तुम्हे छोड़ा कब था? तुम आज भी हो मेरे पास।

और मैं निःशब्द बस उसे देखती रही बस देखती रही और फिर मैंने कहा जीत जानते हो आज किसी को मेरी बातें पसंद है ,किसी को मेरा दिल ,किसी को मेरा पलभर का साथ पसंद है, किसी को तन, पर किसी को मैं क्यू नहीं पसंद ? ऐसा क्यों जीत बोलो

जीत बोला पगली मुझे तो बस तू पसंद है जो लोग तुझे टुकड़ो में पसंद करते है वो बस अपनी आत्मसंतुष्टि पाते है पर तूम तो हमेशा से मेरी हो बस मेरी और मैं तुम्हारा जीत ।

गहरी खामोशी के बाद जीत ने फिर पूछा

"मिली क्या हमारा प्रेम पुराना हो गया"?

नहीं जीत "प्रेम कभी किसी रिश्ते का मोहताज नहीं होता

न तो वो मरता न ही पुराना होता "हाँ कभी कभी परिस्थितियों की वजह से हम दूर हो जाते हैं। लेकिन उम्र के किसी भी मोड़ पर अगर पहला प्रेम मिल जाता है तो यकीन करो सोलह साल वाला अनुभव खुद ब खुद होने लगता हैं ।जैसे आज हम उस अनुभव को महसूस कर रहे। मानो हम वर्षो बाद नहीं मिल रहे ऐसा लग रहा है की हम कभी बिछड़े ही न थे।

हाँ ,"मिली"

हमारी मोहब्बात भी कितनी अजीब थी न? न हम कभी छुप कर मिले न कभी कोई वादा किया।पर हम एक दूसरे की यादो में आज भी वैसे ही है जैसे हम पहली बार मिले थे।

हाँ शायद यही हमारी खामोश मोहब्बत थी । जीत तुमने अपने कैनवास पर न जाने कितनी रेखाये खींची पर तुमने मुझे क्यों न बनाया ?

इस क्यों का जवाब बस इतना सा है की जो तस्वीर मेरे मन के हर कोने में बसी है उसे बस मैं देखूँ बस मैं महसूस करू। तुम तो आज भी बिलकुल वैसे ही दिखती हो जैसे सत्रह सालों पहले थी।वही भोली सूरत वही निश्छल मुस्कान ।तुम तो बिलकुल नही बदली हा थोड़ी सी भर गई एक मुस्कान के साथ जीत बोला मेरी यादों की तरह हो गई हो मगर आज भी वैसी ही मासूम हो ।

आहा जीत तुम तो कुछ भी न भूले । जानते हो तुम्हारे रंग ही है जो मुझे तुम्हारे करीब ले आये थे और तुम्हारे रंगों की याद ने मुझे तुममें ज़िंदा रखा।

जीत तुम सिर्फ मेरी चाहत नहीं हो,तुम मेरा यकीन हो।

इसलिए तो आज तक तुम्हे भूलने की कोशिश ही नहीं की

आज भी जब तुम बंद पलकों के बीच आते हो ऐसा लगता है मानो उम्र भर का दर्द तुम्हारी मीठी मुस्कुराहट के बीच खो गया ।मैं फिर से ज़िंदगी को जीने लगती हूँ बस इस एहसास के साथ की तुम अब भी मेरे हो।

जीत निःशब्द अश्रुपूर्ण निगाहों से मुझे देखता जा रहा है।

तभी मोबाइल बजा तो घड़ी पर नजर गई शाम के 7 बज चुके थे मिली ने कहा अब चलती हूँ फिर मिलेंगे पुरानी यादों और खामोश मोहब्बत के साथ।।


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