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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

सपनों की दुल्हन और सड़क

हरीश कंडवाल “मनखी”

संदीप आम लोगों की तरह अपना गॉव छोड़कर रोजगार की तलाश में महानगर की उन्मुख हुआ, दिल्ली में एक कंपनी में काम करने लगा, तन से दिल्ली में और मन तो गॉव में ही रमा रहता। संदीप के सपनों में कोई सपनों की रानी नहीं आती बल्कि सपनों की सड़क आती। संदीप का गॉव मुख्य मार्ग से 7 किलोंमीटर दूर ऊपर चढायी पर है। संदीप हमेशा यही सोचता कि कब उसके गॉव में सड़क पहॅुचे और वह अपना गॉव अपनी बाईक से जाये।

इस साल कोरोना महामारी के लिए लॉकडाउन हुआ तो वह भी दिल्ली में कोरोन्टाईन हो गया। अब रोजगार नहीं था, बंद कमरे में बैठे बैठे बस उसे अपने घर गॉव की याद आती। दिल्ली के घुटन भरे कमरे में करवटें बदलते बदलले उसे बस अपने गॉव की हर खेत, मकान, पेड़ घर का कोना कोना याद आता, कभी बचपन तो कभी स्कूल के दिनों में खुद को खोया पाता, कभी कभी संदीप कल्पनाओं में इतना डूब जाता कि वह गॉव की सड़क बना लेता और अपनी बुलट लेकर अपनी होने वाली सपनों की रानी को बिठाकर ले जाता उसकी सपनों की वो रानी उसकी कमर को पीछे से पकड़ी हुई होती और वह पहाड़ में घुमावदार मोड़ों पर हॉर्न बजाता हुआ जा रहा होता, तो कभी वहॉ सडक के किनारे अपना होटल का मालिक समझता, खाली दिमाग शैतान का घर, समय निकालने के लिए फोन और काल्पनिक संसार ही तो अपना था।

जब लॉकडाउन नहीं खुला तो उसके बाद संदीप ने अपने घर जाने का फैंसला कर लिया, वह पास बनवाकर अपने गॉव में आ गया। संदीप का गॉव यमकेश्वर ब्लॉक के ढांगू पट्टी में जोगयाणा नाम से है, यह मोहनचटटी के पास महादेव सैण मे सडक से 7 किलोमीटर दूर ऊपर पहाड़ी में स्थित है। संदीप अपने गॉव में बने प्राथमिक विद्यालय में 14 दिन क्वांरटीन सेण्टर में रहा जहॉ उसने अपने बालकपन के दिन बिताये थे, स्कूल में रहते उसे अपनी स्कूल के समय की सारी यादें कुरेद कुरेद कर सामने आती, कभी खुद ही बुदबुदा जाता कभी खुद में ही हॅस लेता, तो कभी फिर नीचे मोहनचट्टी की तरफ हेंवल नदी को देखता और सोचता कि काश हमारा गॉव जोगियाणा भी इसी नदी के किनारे होता। क्वारंटीन में रहते हुए संदीप ने घर में रहकर क्या रोजगार करना है, कैसे करना है, इस सबकी प्लानिंग करनी शुरू की। कभी उसका उत्साह दुगना हो जाता तो दूसरे पल ही सड़क नहीं होने के कारण सारे के सारे उसके सपने एक पल में मिट्टी के गीले डले की तरह चूर चूर हो जाते।

स्कूल में क्वारंटीन के दौरान अनेकों सपने पाले और पल भर में वो गैर हो गये, स्कूल अपना गॉव के नजदीक का था, सामने गॉव दिखता, उधर मोहनचट्टी नजर आती सामने नीलकंठ मंदिर दिखता ईधर कभी मई जून में जगमगाते कैंम्प और उनमे पर्यटकों को लगा हूजूम। आज सब सुनसान पड़े नजर आ रहे थे, नीलकंठ और सिलोगी गैडंखाल सड़क सुनसान नजर आ रही होती, कभी किसी ने नहीं सोचा था कि हमेशा पर्यटकों की भीड़ से लदे रहने वाले होटल आज किसी वीरान पड़ी हवेलियों की तरह नजर आ रहे थे, कोरोना की इस कुदृष्टि पर संदीप सोचता।

14 दिन क्वांरटींन में कब निकले पता नहीं चला, हॅसते खेलते एक बार फिर पुनः बिना लिखाई पढाई के गुरूकुल में दिन बीत गये, घर आकर एक अलग सी खुशी हुई, मॉ का लाड़ और पिताजी का दुलार मिला, कुछ देर तो घर आने की खुशी में समय निकल गया, लेकिन उसके बाद फिर मन में एक ही ख्याल कि अब घर में क्या रोजगार करूं। दिन में पड़़ौस में रहने वाले चाचा जब अपनी बकरियों को लेकर चुगाने गये तो लगा कि बकरी पालन भी अच्छा व्यवसाय है, चाचा से बात करनी शुरू कर दी। चाचा ने कहा बेटा करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन आज के समय में काम करने के लिए सड़क का होना जरूरी है, हमारा तो समय निकल गया तब जमाना कुछ और था अब कुछ और है।

बेटा आज के जमाने में रोजगार करने के लिए सड़क का होना जरूरी है, बेटा बकरी का व्यापारी भी उसी गॉव में जाता है, जिस गॉव में उसकी बाईक या गाड़ी पहुँच सके। हमारे गॉव में तो सड़क का हाल क्या है तुम जानते ही हो। बकरी पालन में फायदा है, लेकिन मेहनत चाहिए, वैसे तो हर काम में मेहनत चाहिए ही।

संदीप अपने गोशाला में गया उसकी मॉ ने भी 10-12 बकरियां पाल रखी हैं, वह मॉ के साथ उन बकरियों को चुगाने चला गया। संदीप की तरह उसके गॉव में और युवा भी आ गये हैं, सब घर में रहकर रोजगार करना चाहते हैं, लेकिन भविष्य अभी अंधकार मय नजर आ रहा है, क्योंकि यदि रोजगार करते भी हैं तो बिना सड़क के रोजगार करना संभव नहीं है। ग्राम प्रधान से उन्होने इस संबंध में बात की तो उन्होनें कहा कि इस ंसबंध में वह क्षेत्रीय विधायक से पत्राचार कर सड़क बनाने को कहेगें।

संदीप की शादी भी नहीं हो पा रही है, क्यांकि उसके गॉव में सड़क नहीं है, हर लड़की का यही सवाल होता कि यदि शादी के बाद गॉव में रहना है और रोजगार भी करना है तो सड़क होनी जरूरी है, अब संदीप इसी उहापोह में अपना ये समय काट रहा है कि यदि सड़क नहीं बनी तो उसकी शादी भी नहीं होगी और क्या फिर उसे वापिस दिल्ली जाना पड़ेगा या फिर घर में रहकर ही रोजगार, अभी वह इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने का प्रयास कर रहा है, अब देखना यह होगा कि क्या संदीप के सपनों की दुल्हन कब हकीकत में जमीन में बनी सड़क पर आ पायेगी या फिर इंतजार और इंतजार।


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