मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

गरमी का अब मौसम आया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

तालाबन्दी में जन-जीवन, कोरोना ने बहुत डराया। चहल-पहल सहमी-सहमी है, गरमी का अब मौसम आया।। -- मलयानिल की बाट जोहते, नव पल्लव भी मुरझाये हैं। पीपल, गूलर भी आहत हैं, युकलिप्टस भी बौराये हैं।। ओढ़ धूप की धवल चदरिया, सूरज ने अब रंग दिखाया। चहल-पहल सहमी-सहमी है, गरमी का अब मौसम आया।। -- जीव-जन्तु आहत हैं कितने, चातक-दादुर हैं अकुलाये। तन-मन को लू ने झुलसाया, मानसून जाने कब आये। खेतों में पड़ गई दरारें, टिड्ढी दल नभ में मँडराया। चहल-पहल सहमी-सहमी है, गरमी का अब मौसम आया।। -- झोंपड़ियाँ सहमी-सहमी हैं, महलों में भी चैन नहीं है। निष्ठुर हआ दिवाकर दिन में, सुख की अब तो रैन नहीं है। सूख गये हैं ताल-सरोवर, हरियाली का हुआ सफाया। चहल-पहल सहमी-सहमी है, गरमी का अब मौसम आया।। -- तपती गरम तवे सी धरती, सूरज आज जवान हुआ है। हिमगिरि से हिम पिघल रहा है, पागल सा दिनमान हुआ है। एसी-कूलर फेल हो गये, कोरोना ने जाल बिछाया। चहल-पहल सहमी-सहमी है, गरमी का अब मौसम आया।।।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें