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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

दुविधा में मजदूर

डा० डी एम मिश्र

इधर भुखमरी,उधर कोरोना दुविधा में मजदूर बीवी ,बच्चे भी हैं संग में है कितना मजबूर सुनने वाला कौन किसी की लेकिन करुण पुकार भूखों मरते लोग , न पिघले सत्ता कितनी क्रूर हम भी, तुम भी,तुम भी उसकी मौत के जिम्मेदार खाये पिये अघाये हम सब मद में अपने चूर और किसी के मन की पीड़ा को भी तो समझें अपने मन की बातें बांच रहे सारे मगरूर तीन दिनों से भूखा वो मजदूर रहा है पूछ भैया मेरा गांव यहां से अब है कितनी दूर ॽ देश के सब करखाने उसके दम से चलते हैं फिर भी वो खामोश है उसका सिर्फ़ है एक कसूर यह उम्मीद अभी उसकी आंखों में तैर रही उसकी रक्षा करने वाला होगा कोई ज़रूर

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