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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

प्यासी चिड़िया

महेन्द्र देवांगन "माटी "

देख रही है बैठी चिड़िया, कैसे अब रह पायेंगे । काट रहे सब पेड़ों को तो , कैसे भोजन खायेंगे ।। नहीं रही हरियाली अब तो , केवल ठूँठ सहारा है । भूख प्यास में तड़प रहे हम , कोई नहीं हमारा है ।। काट दिये सब पेड़ों को तो , कैसे नीड़ बनायेंगे । उजड़ गया है घर भी अपना , बच्चे कहाँ सुलायेंगे ।। चीं चीं चीं चीं बच्चे रोते , कैसे उसे मनायेंगे । गरमी हो या ठंडी साथी , कैसे उसे बचायेंगे ।। छेड़ रहे प्रकृति को मानव , बाद बहुत पछतायेंगे । तड़प तड़प कर भूखे प्यासे , माटी में मिल जायेंगे ।।

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