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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

चुप रहते नहीं

डॉ० अनिल चड्डा

कुछ कहते नहीं, चुप रहते नहीं, ग़लत बात को पर हम सहते नहीं। लाख चमचमओ तुम सोने की तरह, किसी लालच में हम तो बहते नहीं। ख्वाब बेशक लें रेत के घर की तरह, इरादों में हम कभी ढहते नहीं। बुराई तो बुराई, अच्छाई भी काम आई नहीं, दिल के शिकवे किसी से पर कहते नहीं। कौन पोंछता है अश्क किसी के, अश्क इसीलिए अब बहते नहीं।


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