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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



आँखे कुछ बोलती हैं


रवि प्रभात


                                
तुम्हारी आँखे मुझ से कुछ बोलती हैं 
जाने अनजाने राज खोलती हैं 

नज़रे टकराकर जब झुक जाती हैं 
बिना कुछ कहे वो रुक जाती हैं

दिल करता हैं पूछ लूँ एक बार 
क्या हैं आँखो में सुन लूँ एक बार 

पर रुक जाता हूँ तुम्हारी सूरत देख कर
कुछ जाने अनजाने सवाल सोच कर 

फिर भी तुम्हारी आँखे कुछ बोलती हैं 
जाने अनजाने राज खोलती हैं 

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