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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



मालवी कविता -
वा कोई नि म्हारी बई थी


राजेश भंडारी “बाबू”


                             
बाल्टी भरी के पानी से न्हातो  थो 
कपड़ा भी रोजाना  धुलवातो  थो  ,
कोई भी प्यासो   घर से नि जातो  थो  ,
सगलो पानी माथा पे तोकी  के आतो थो  ,
उ पानी कुण्डी से खेची के माथा पे ,
लाने वाली और कोई नि... म्हारी बई थी |
 
गर्मी में कुण्डी सुकी जाती थी ,
बाल्टी घनी उंडी चली जाती थी,
परोड़ा में जल्दी पानी भरवा जाती थी ,
आदी दफोर तक वा रोटी नि खाती थी 
पर सबके टेम पे रोटी खिलाती थी 
देसी चूल्हा पे रोटी बनाने वाली 
और कोई नि......म्हारी बई थी |
 
थोड़ा दन बाद एक हेंड पम्प आयो ,
आखो गाम उका उपर लुम्बायो ,
आदी रात से लाइन लागी जाती 
वा सबका पेला पानी भरवा जाती 
हेंडपम्प से पेट में बल पड़ी जाता था 
पर फिर भी सब पूरी बाल्टी से न्हाता था 
रोज रात के पेट पकड़ी के बेठने वाली 
और कोई नि .........म्हारी बई थी |
 
गर्मी की छुट्टी मनावा  पामणा आता 
सेर की बंधी जिन्दगी से निजात पाता ,
पामणा का आतेज उके बेडो दिख्तो थो 
खाली टंकी और हलक को थुक सुख्तो थो 
भर्या बुखार में भी पानी भरने वाली ,
और कोई नि ..........म्हारी बई थी |
 

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