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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



अस्तित्व


नीतू शर्मा


 
खुद में खुद को ढूँढकर अब जानना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
फिर अमावस की निशां में चाँदनी सोई,
इन अंधेरों में कहीं फिर रौशनी खोई ।
आस के दीपक से तम को ताड़ना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
जिंदगी की उलझनों में उलझे बैठे हो,
जो असल मकसद है उसको भूले बैठे हो ।
हो समय कितना कठिन दिल थामना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
भीड़ में दूनियां की ऐसे खो गये कैसे,
है सफर लम्बा अभी से सो गये कैसे ।
देख ! तुझको नींद से अब जागना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
हां पथिक पथ में कई परेशानियां होगी,
देखकर उनको तुझे हैरानियां होगी ।
जब डगर पे मुश्किलों से सामना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
हौसले हरदम गिराना जो चाहेंगे,
तेज झोंके इन हवाओं के जो आएंगे ।
आंधी तूफां को भी संबल मानना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
हां असीमित शक्तियां तुझमें समाई है,
पर हताशा की धूलि उन पे छाई है ।
रंजो गम की गर्द को अब झाड़ना होगा,
है तेरा अस्तित्व क्या पहचानना होगा ।
 

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