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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



संघर्ष और प्रेम


मोनिका कुमारी


                                
प्रेम में वादे सिर्फ तुमने ही नहीं किये थे ,
मैंने भी किये थे तुमसे― कभी एक दूसरे 
का साथ न छोड़ने की ।
सपने सिर्फ तुमने ही अकेले 
नहीं देखे थे,
छोटे से घर में साथ रहने की ।
जितने भी पल तुम मुझसे 
बिछड़ जाने के ख़्याल से ,
डरे हो 
उतने ही पल मैं भी डरी ।
जीवन के प्रत्येक पलों 
को वफ़ादारी से एक दूजे के संग निभाते चले,
हर परिस्तिथि में एक दूजे को सम्भालते रहे ।
फिर मैं कैसे आज तुम्हे अकेले छोड़ दूँ,
कैसे तुमसे यह कह दूँ की जाओ और लड़ो अपने प्यार के लिए ,
की 
अपने प्यार को पाने की जिम्मेदारी 
सिर्फ तुम्हारी है।
आज जब हमारा प्रेम जाति, धर्म,कुल 
के कटघरे में खड़ा किया गया है ,
मुझको डर घेरे हुए है ,
किसी भी पल हमारे प्रेम को 
सज़ा सुनाई जा सकती है,
किसी भी पल हमारे प्रेम 
को फाँसी में फंदे में डाल 
कर बेरहमी से मारा जा सकता है।
पर प्रिय !
तुम चिंता मत करना,
प्रेम में संघर्ष करना सिर्फ 
तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं ,
मेरी भी है ,
प्रेम सिर्फ तुमने नहीं किया मैंने भी किया है 
तुमसे , 
मैं हमारे प्रेम की इस लड़ाई में ,
लडूंगी, 
और अपने जीवन के अंत तक लडूंगी,
इन खोखली जाति, धर्म,और कुलवादियों से ,
इस प्रेम की लड़ाई में मैं तुम्हारा अंत तक साथ दूंगी ,
हमारा प्रेम जीतेगा या हम अमर हो जायेंगे इस संघर्ष से।......
 

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