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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



महंगाई जाम


केशव कुमार मिश्रा"सम्राट"


    
महंगाई ने कैसा!
सितम कर दिया,
है न जीने दिया,
और न मरने दिया,
दाम बढ़ने लगा,
मांग घटने लगा,
और बैचेनी की!
हमको वजह दे गया,
तेल ऊपर चढ़ा,
और चढ़ता ही गया,
रूप्या नीचे गिरा,
और गिरता ही गया।
चढ़ने उतरने के!
इस खेल में,
हम भी गिरते गए,
और मरते गए,
पर हमारी सहादत से,
कुछ न हुआ,
सरकारें सोती रही,
जनता रोती रही।
अब तो मरने की हमको!
वजह मिल गयी।
या घुट घुट के जीने की!
राह मिल गयी।
दाम ऐसा बढ़ा,
नशा मुझपे चढ़ा,
बिना पीये ही,
मैं तो लुढ़क सा गया।
आलू ऊपर चढ़ा,
दाल नीचे गिरा,
चावल ने अब तो,
गजब कर दिया,
प्याज ने भी जब देखा,
बढ़े दामों को,
तब वो भी उछलकर,
खड़ी हो गयी,
बढ़े दामों ने हमको,
न उठने दिया,
अब तो चलना मेरा,
इस जहां में कहीं,
बस दुष्वार है,
बस दुष्वार है।
दैनिक जीवन चलाना,
अब आसान नहीं,
गर मैं जी भी गया,
तो मुझमे प्राण नही।
आम जनता तो!
इससे परेशान हैं,
पैसे वाले तो!
बिल्कुल ही अनजान हैं,
कुछ को तकलीफ है,
कुछ मजे में जी रहे,
कुछ"महंगाई"जाम को,
हैं छककर पी रहे।
मेरी हालात तो!
अब ऐसे हो गयी,
न मैं जी ही रहा,
और न मर ही रहा।
काश!कोई तो हो,
जो इस महंगाई को,
खत्म कर दे अब!
सदा सदा के लिए,
जो भी ऐसा करे,
मेरी दुआ है ये,
उसके बच्चे भी,
अब जुग-जुग जिये,
अब जुग-जुग जिये 
 

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