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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



नीरा


डा० कनिका वर्मा


                                
मैं नारी हूँ नीरा
मैं पानी बन बहती चली

खेली पर्वतों के आँगन में
इतराई वादियों के आँचल में

झरना बनी तो सब पास आ मुझमें समा गए
बाढ़ बनी तो सब त्राहि होकर दूर भागे

बरखा बन गिरी और सींचे खेत
जहाँ नहीं बरसी, हुई मरुस्थल में रेत

किसी ने गंगा समझ अपने पाप धोए
किसी ने छिड़क कर अपनी ज्वाला बुझाई

थी बनारस के घाट पे अति पवित्र
हुई चार कोस पे मैली

नैनों से टपकी तो गले लगा लिया
पसीना बन गिरी तो गंधित करार दिया

कभी बाँध में रहकर भी ना सिमट पाई
कभी सागर में समा कर भी अस्तित्व ना पाई

रही सीमा में तो अपने किनारे बसाए ग्राम नगर
सुनामी बन उत्पात मचाया तो उजाड़े शहर

मैं नारी हूँ नीरा
मैं पानी बन बहती चली

 

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