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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



फूल का संदेश


कमला घटाऔरा


    
बासंती सुनहरी सबेर में
अभी अभी एक फूल 
शीश उठा मुस्कुराया था 
डाली पर लहराया था ।
फिर ,
कुछ विस्मित हो नीचे जो देखा उसने
धरा पर पड़े मुरझाये फूल को 
सिर उसका चकराया था।
पूछ बैठा, हे सहोदर तुम इस तरह जमीन पर?
बोला मुरझाया फूल,
यह जीवन का अन्तिम अध्याय है मेरे भाई ।
माटी में मिल माटी होजाऊँगा ,
पुन: नव जीवन धार मैं आऊँगा ।
कल मैं वहाँ था आज तू है
कल तू यहाँ होगा और 
कोई और तेरी जगह होगा 
यही नियति है मेरे भाई !
हर आने वालों की 
इक दिन सपनों के झूले 
उड़े ऊँचें लगे अम्बर छूले 
अगले पल कौन जाने 
किस माटी तले दबे , सब भूले 
जी ले हर पल को
महका दे बगिया
ले हवा उड़े खुशबू तेरी
पाये विस्तार प्यार तेरा 
घर घर निर्बंध फिरे 
खोल दे हृदय के सब बंद द्वार
उत्सर्ग में जीवन की शान 
अमरता किसने पाई ?
प्रस्थान सब ने किया ,जो आया ।
नि:स्वार्थ भाव से 
तू कोई पुण्य कमा ले 
ओ मेरे सहोदर , 
तू इतना जान ले सहना ही पड़ता 
हर दुख सुख जीवन का  
कभी धूप सा कभी छाँव सा 
जो मिले स्वीकार ले
दिल में उतार ले ,
बाँट कर खुशबू तू अपनी
जीवन संवार ले ।
 

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