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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



इंसान और प्यास


कवि जसवंत लाल खटीक


  
हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई ,
हम सब है भाई- भाई ।
इस कलयुगी,  दौर में ,
ये बात , इस बच्ची ने बताई ।।
सबका खून ,होता लाल ,
फिर भी लड़ते , दिन और रात ।
सबकी प्यास , बुझाता है ,
कभी , पानी , नही पुछे जात ।।
तपती दुपहरी , में बैठते ।
मन्दिर -मस्जिद , के बाहर ।।
या खुदा ! ये भी तो है इंसान ,
कर दो ना , इनका बेड़ापार ।।
देख इंसान ,को प्यासा ,
अपनी बोतल , खाली कर दी ।
बच्ची , को क्या पता ,मजहब का ,
इंसानियत ! फिर से जिन्दा कर दी ।।
धर्म के , ठेकेदार " जसवंत " , 
तेरे देश , को काटते है ।
वरना , बच्चे और भगवान तो ,
सिर्फ , खुशियां ही बाँटते है ।।
  
 

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