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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



धरती माँ की पुकार
विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर समर्पित


कवि जसवंत लाल खटीक


    
धरती माँ , की आँख में , आँसू ,
वो चीख-चीख , कर कहती है ।
क्यों , जहर मुझमे , घोल रहे हो ,
मुझमें , सारी दुनिया रहती है ।।
तुम थोड़े से , लोभ-लालच में ,
कल-कारखाने,  चलाते हो ।
विषेले धुँए , और रसायनों से ,
क्यों , तुम मुझको जलाते हो ।।
जब , कूड़े-कचरे वाला पानी ,
मेरी रगो , में बहता है ।
मेरा , दर्द ! तुम क्या जानोगे  ,
मेरा दम , घुटता रहता है ।।
पेड़ - पौधे , कटते जा रहे ,
विकास , की बलिवेदी पर ।
दिनों दिन , जल रही हूँ , मै ,
ग्लोबल वार्मिंग , का है असर ।।
जल , ध्वनि , वायु प्रदूषण ,
इनसे , मेरा अस्तित्व संकट में ।
सब पर , रोकथाम करलो , वरना ,
समा जाउंगी , मै , मिनट में ।।
" जसवंत ", करे करबद्ध विनती ,
धरती माँ को बचाना होगा ।
भावी पीढ़ी , के भविष्य के लिए ,
पर्यावरण हमें बचाना होगा ।।  
 

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