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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



प्रेम कितना लाजबाब है!

संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

                                                              
काश !
समझा होता
तुमने प्यार
प्यार का सार
अपनत्व को
मिटाकर
अहम् को भुलाकर
जिद को गलाकर
सुनी होती
पुकार।

काश !
तुमने 
न समझा होता
प्यार को पागलपन
आवारापन 
और सौदा
बन जाते घरौंदा।

काश !
तुमने 
समझा होता
समर्पण 
एक शब्द ही नहीं
भाव है
केवल नहीं 
यह ख्वाब है
समझ पातीं
प्रेम कितना लाजबाब है!

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