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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



तुम लौट आना

रजनी कुमारी


तुम लौट आना
उस आखिरी लम्हें के लिए
जब साँसें जिस्म की कैद से आजाद होने को होगी
धड़कनों का धड़कना थमने को होगा
देह अपनी निष्क्रियता की और कदम बढ़ा चुकी होगी
मौत की देहरी पर बैठी 
आँखों की पुतलियां तक तुम्हारी राह तकेंगी
तब तुम लौट आना
बाहें फैलाकर समेट लेना मुझे अपने बाहुपाश में
सुलझाना मेरी असुलझी अलकें
नाखुन गढ़ी हथेलियों पर रख देना 
अपनी खुरदरी हथेलियों से प्रेम 
कि तृप्त हो जाए मेरी अतृप्त आत्मा का एक एक कण
और शरीर के सभी बंधनों को पीछे छोड़
उड़ जाऊ उस अंनत आकाश में...

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