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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



पिता

डॉ.पूर्णिमा राय


पिता ..पर क्या लिखूँ..
वह तो खुद  कलमकार हैं ,
किताब हैं,
जिन्दगी का एक  
अधूरा किस्सा है 
जो सदैव आगे 
पीढ़ी दर पीढ़ी 
वट वृक्ष की तरह जीवंत हैं ,
चलायमान है 
प्रसाद के मनु की तरह 
एक महामानव हैं
जिसने सृजित किया
कामायनी को !!

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