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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



अपने से बात !!

कविता गुप्ता


खुशकिस्मत, फुर्सत मिली अपने से बात करने की ,
इत्तफाक कलम की नोक को रूचि अनुसार ढलने की|
हैरान हूँ कोरे कागज़ भी हैं मेरे आस पास बिखरे हुए ,
दुआ करो, समय मिले खुले दिल से बात लिखने की |

स्याही तो भावनाएँ मेरी, हर सम्भव खुद ही बिखरेगी, 
कोई स्वीकारे या लौटाए, यह अपनी कला को परखेगी |    
पहले जिन पंखों पर हर धार का होता था असर गहरा, 
अब तो प्रतिकूल परिस्थितयों में उड़ान भरना सीखेगी। 

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