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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



जीवन

गंगाशरण शर्मा


सिर्फ छटपटाहटें, बस
देह में फंसी जान की।
कोलाहल से परे
नि:शब्द मृत्यु -मुक्त
करती है जाल से!!
जिंदगी के द्वार पर
जन्मती व्याकुलता,
मौत की चौखट पर
सर पटकती- विवशता
दे रही हो आमंत्रण
किसी अमरत्व को !
तह करके रखा बचपन
यकायक छलांग लगा !
बुढ़ापे के कंधे पर
ठट्ठा लगाती हो सवार,
उड़ती चिड़िया देखता रहा!!

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