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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



एक कविता

अनिल कुमार 'देव'


उम्मीद…
रोज़ साँझ ढलती है
इस उम्मीद के साथ के
सवेरा नई रोशनी बिखराएगा
जो छूट गए हैं काम अधूरे
उन्हें पूरा करने का हौंसला जगायेगा
पानी बहता हैं
क्योंकि वो रुका तो
जीवन चक्र ठहर सा जाएगा
मगर वक़्त है और
एक उम्मीद भी
जो समय के आस -पास चक्कर लगाती है ओर
अपने अस्तित्व को प्रमाणित करते हुए कहती है
के
कितनी भी मुश्किलें हों
कोई साथ हो या न हो
धुध से घिरे हुए विचार हों या
मुश्किलों भरे समाचार हों
मैं मिलूंगी वहीं
किसी की खुशी में
किसी की मुस्कुराहट में
किसी के दर्द में
किसी की चाहत में
या ,
फिर शायद
तुम्हारे साथ ही
जब तुम ज़िंदगी से डर कर
घबराकर ,
हारकर ,
लोगों से दूर अकेले बैठोगे
तो
प्यार से तुम्हारा हाथ थामे हुए
वहीं तुम्हारे पास
तुम्हारे साथ...

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