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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



फिर एक और दिन !

डॉ० अनिल चड्डा

                                                              
फिर
एक और दिन
तेरी
मधुर यादों से
भरा हुआ !
 
पर
मन मेरा
भीतर ही भीतर
थोड़ा है
डरा हुआ !!
 
कि, दिन
जल्दी से
बीते ना
रात का आवरण
कहीं
जीते ना !
 
और
भटक जाउॅं मैं
फिर से
अंधेरों में
रात का सूनापन
कभी भी
बीते ना !!

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