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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

अन्तर्राष्ट्रीय मातृ दिवस को समर्पित .....
जगत जननी माँ

डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"

माँ का ममत्व एवं त्याग घर ही नहीं, सबके घट को उजालों से भर देता है। माँ का त्याग, बलिदान, ममत्व एवं समर्पण अपनी संतान के लिये विराट है जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो माँ के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना। बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं। एक माँ का हृदय बच्चे की पाठशाला है।1। हर एक के जीवन में माँ एक अनमोल इंसान के रूप में होती है मां को शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। एक माँ हमारे जीवन की हर छोटी बड़ी जरूरत का ध्यान रखने वाली और उन्हें पूरा करने वाली देवदूत होती है। कहने को वह इंसान होती है, लेकिन भगवान से कम नहीं होती। वह ही मन्दिर है, वह ही देवी है और वह ही तीर्थ और सब की पूजा है। जिसका कोई नास्तिक नहीं। समूची दुनिया में मां से बढ़कर कोई इंसानी रिश्ता नहीं है। वह सम्पूर्ण गुणों से युक्त है, गंभीरता में समुद्र और धैर्य में हिमालय है उसका आशीर्वाद वरदान है। जरा कभी मां के पास बैठो, उसकी सुनो, उसको देखो, उसकी बात मानो। उसका आशीर्वाद लेकर, उसके दर्शन करके निकलो। जो चाहोगे मिलेगा- सुख, शांति, शोहरत मिलेगी दौलत और कामयाबी।2। संसार महान् व्यक्तियों के बिना रह सकता है, लेकिन माँ के बिना रहना एक अभिशाप की तरह है। इसलिये संसार मां का महिमामंडन करता है, उसके गुणगान करता है, मातृ दिवस या माताओं का दिन है चाहे जिस नाम से पुकारें दिन निर्धारित है। मातृ दिवस-समाज में माताओं के प्रभाव व सम्मान का उत्सव है। माँ शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। माँ के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किन्हीं शब्दों में नहीं होती। माँ नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। माँ के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। माँ रूपी सूरज चरेवैति-चरेवैति का आह्वान है। उसी से तेजस्विता और व्यक्तित्व की आभा निखरती है। उसका ताप मन की उम्मीदों को कभी जंग नहीं लगने देता। उसका हर संकल्प मुकाम का अन्तिम चरण होता है।3। सभी प्रकार के प्रेम का आदि उद्गम स्थल मातृत्व है और प्रेम के सभी रूप इसी मातृत्व में समाहित हो जाते हैं। प्रेम एक मधुर, गहन, अपूर्व अनुभूति है, पर शिशु के प्रति माँ का प्रेम एक स्वर्गीय अनुभूति है। ‘माँ!’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ' वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ' की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है, जिसने आपको और आपके परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में आपकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है।4। हर संतान अपनी माँ से ही संस्कार पाता है। लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी मां ही देती है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में माँ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख है माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए कोई आवश्यकता नहीं।5। जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से नहीं बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो मां ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्में एक माँ की कोख में होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना, जिस वजह से कई रातों तक माँ सो भी नहीं पाती थी। वह गिले में सोती और हमें सूखे में सुलाती। जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। ऐसी माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है।6। माँ शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। माँ के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। इसका अनुभव भी एक मां ही कर सकती है। माँ अपने आप में पूर्ण संस्कारवान, मनुष्यत्व व सरलता के गुणों का सागर है। माँ जन्मदात्री ही नहीं, बल्कि पालन-पोषण करने वाली भी है। माँ तो ममता की सागर होती है। जब वह बच्चे को जन्म देकर बड़ा करती है तो उसे इस बात की अपूर्व एवं अलौकिक खुशी होती है, एक आशा रहती है उसके लाड़ले पुत्र-पुत्री से अब सुख मिल जाएगा। लेकिन मां की इस ममता को नहीं समझने वाले कुछ बच्चे यह भूल बैठते हैं कि इनके पालन-पोषण के दौरान इस माँ ने कितनी कठिनाइयां झेली होगी।7। एक शिशु का जब जन्म होता है, तो उसका पहला रिश्ता माँ से होता है। एक माँ शिशु को पूरे नौ माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में शिशु और माँ के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा अनमोल रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता शिशु के जन्मने के बाद साकार होता है और जीवनपर्यन्त बना रहता है। माँ और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर माँ बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी माँ को ही याद करता है। माँ का दुलार और प्यार भरी पुचकार ही बच्चे के लिए दवा का कार्य करती है। इसलिए ही ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है। दुनिया का कोई भी रिश्ता इतना मर्मस्पर्शी नहीं हो सकता। माँ एक ऐसा बैंक हैं जहाँ हम अपने चोटों और परेशानियों को जमा कर के रखते हैं।8। ‘माँ’ के इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता, समग्रता निहित है। अणु-परमाणुओं को संघटित करके अनगिनत नक्षत्रों, लोक-लोकान्तरों, देव-दनुज-मनुज तथा कोटि-कोटि जीव प्रजातियों को मां ने ही जन्म दिया है। माँ के अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है प्रेम की यह चरमता केवल माताओं में ही नहीं, सभी मादा जीवों में देखने को मिलती है। अपने बच्चों के लिए भोजन न मिलने पर हवासिल (पेलिकन) नाम की जल-पक्षी अपना पेट चीर कर अपने बच्चों को अपना रक्त-मांस खिला-पिला देती है। किन्तु त्याग की यह चरमता ही माँ अर्थात् नारी जाति की शत्रु बन गयी। समाज पुरुष प्रधान होता गया और नारी का अवमूल्यन होता गया। धीरे-धीरे वह पुरुष की उपभोग्या, उसके ‘चरणों की दासी’ बनकर रह गयी। शिक्षा-आत्मसम्मान से वंचिता दासी की संतति महान कैसे हो सकती है? उसमें तो दास सुलभ चारित्रिक प्रवृत्तियां आएंगी ही।9। कितनी दयनीय बात है कि देश ने स्त्री की शक्ति के रूप में अवधारणा दी, जिसने पुराणों के पृष्ठों में देवताओं को चार और आठ हाथ दिये किन्तु देवियों को एकसौ आठ हाथ दिये, उसी ने स्त्रियों को पुरुषों से नीचा स्थान दिया और उन्हें वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया। और सबसे शोचनीय बात यह है कि उन्हें चारदिवारी में बंद कर दिया। ’माँ’ को उसकी दैवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से आज एक है।10। माँ प्राण है, माँ शक्ति है, माँ ऊर्जा है, माँ प्रेम, करुणा और ममता का पर्याय है। माँ केवल जन्मदात्री ही नहीं वह जीवन निर्मात्री भी है। माँ धरती पर जीवन के विकास का आधार है। माँ ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मनमस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी माँ, माँ ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी माँ वैसी ही है, माँ नहीं बदली। एक माँ की गोद कोमलता से बनी रहती है और बच्चे उसमें आराम से सोते हैं। वही जगत जननी है, वही सब है, वही रब है।11।


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