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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

महामानव

अनिल कुमार

वह बूढ़ा अधनंगा देश का सच्चा सिपाही लाठी रखकर भी था अंहिसा का राही सतपथ पर चला उम्रभर हो दृढ़ चित्त मौन होकर भी महान क्रांति का जनक शांत से भाव झलकते चेहरे पर जिसके नित थी फिर भी मन में ददकती ज्वालामुखी परतंत्रता, दुश्शासन के ज्वलन्त विरोधों की त्याग दिया जिसने अपना सर्वस्व देश के खातिर, लड़ा जो शांति, मधुरता से सत्याग्रह की शांत चिनगारी सुलगाकर जिसने प्रज्वलित की देशभक्ति की अमर लौ वह निश्छल, पवित्र प्रतिमा अमर हो गई लिखकर इतिहास की छाती पर अपने त्याग, बलिदान, देशभक्ति की कहानी उसने सिखलाया बिन लाठी के भी हो सकती है महान क्रान्ति उज्ज्वल बस मन के विश्वास की ज्वाला सुलगे और जल उठे उस ज्वाला से कर्मशील लाखों अन्तर्मन की सोई हुई अभिलाषाएँ फिर उस अनन्त आकाश में अनुगुँज रहेगी उस अहिंसा के पुजारी महान पथिक की वह बतलाकर गया महामानव के संदेश को उसने दिखलाया उद्देश्य प्राप्ति अथक प्रयास और मिल सकती है पूर्ण समर्पण से उस उद्देश्य से स्वयं को एकाकार कर लेने पर वह अपने सिद्धान्तों के पथ पर चढ़कर बदल गया इतिहास के काले बोल और बदला जिसने सोच के पंगु सवालों को उस महामना, महान सत्य के संयासी की पर धुँधली हो गई आज है सब अवधारणा अब उसके बोलों का मौल भूल गये सब और भूले उस महान मानवता के साधक को अब उन विचारों को संकीर्ण कर दिया देश के रखवाले ठेकेदारों, जयचंदों और गद्दारों ने वह विचार अब निष्प्रभाव, बेकार हो गये दिखता, सब ने पूजा उस पवित्र प्रतिमा को पर मन तक उसकी आवाज न पहुँची अच्छा हुआ जो मारा गया वह मानववादी वरना रोता अपने त्याग का खून देखकर और सोचता जिनकी खातिर जीवन को दाह किया अपना समझा अपनेपन का निर्वाह किया वह तो गैरों से भी गैर स्वार्थ के परिजन देश की दीमक, लुटेरों के सरदार निकले बस अब उस महामानव को मुक्ति दो उस अधनंगे ज्वलन्त विचारक को स्वतंत्र कर दो अपने ही देश की बेड़ियों से क्योंकि अब उसकी आवश्यकता, उसकी उद्धारता बेमोल हो गई, पर व्यापार चल गया उसके नाम, धन की छाप रही बस तो उस आजादी के सच्चे सिपाही को आकाश के शीतल चाँद की तरह शांत शून्य में विलीन, फिर भी विस्तृत आभा युक्त शांति की उच्चतम अवस्था में निर्मग्न होकर प्रकाशित, उज्ज्वल पहचान पाकर भी असीम चिरनिद्रा में सोया हुआ, अपरिचित और गुजरा हुआ स्वर्णीम युगपथ रहने दो क्योंकि अब उसके विचारों को ढोने की क्षमता शेष नहीं, किसी संघर्षशील प्राणवान में और कोई चाहता भी नहीं, कि वह उठे लौट आने को, लेकर अहिंसा की लाठी या फिर उसका स्वर गुँज उठे फिर से कि लाठी लेकर अंहिसा का पुजारी फिर लौट आया असत्य के अन्धकार को मिटाने और सत्य, कर्म, अहिंसा की लौ जलाने।


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