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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



" तसव्वुर "

रश्मि सुमन


हर रात तसव्वुर लिए हथेली पर,
निकलता मन दहलीज़ के उस पार,
जज़्ब करने को सब कुछ सीने में,
जहाँ भी कदम पड़े हैं स्मृतियों के...
मन निकाल लाया उन फूलों को भी 
स्मृतियों के वातायन से......
जिसे छुपाया था कभी
मुड़ी तुड़ी पीली पड़ चुकी किताब के सीने में.....
उन पन्नों से निकली
कुछ कविताएँ और कृतियाँ ,
कसने लगी मुझ पर फब्तियाँ.....
कैसे आई दिखलाने आज अपनी झलकियाँ ???
अतीत के झरोखों से
दिखी कुछ अधूरी ख्वाइशों की आकृतियाँ ,
जो तारीखों, दुआओं और मन्नतों की जिद लिए स्याही बन बैठ गयी थी ,
जिसे सुला दिया था मैंने
दे देकर थपकियाँ....
फिर से सिहरा गयी मुझे
अतीत की ये वादियाँ.....
कितना कुछ बदल जाता न!!
उम्र के साथ साथ ,
समझौतों में लगभग बदल जाती
बचपन की सारी नादानियां..

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