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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



"कैसे दे दूँ मकान की संज्ञा.... इन दीवारों को??? "

रश्मि सुमन

तन एक ढाँचा
जो तना रहता अहंकार में ,
मिटना है इसे मृत्यु से ही
ऐसे ही अहं भी, मात्र एक ढाँचा ,
जो रहता जीवंत ,
" मैं " के मिटने के भय से ही...
नहीं मिट सकता तो केवल
उस ढाँचे के भीतर का शून्य
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मकां तो हम सब ही बनाते ,
मिटना है इसे भी ,
दीवारें भी गिरेंगी इक दिन ,
बदलेगा ,सब कुछ खँडहर में ,
चाहे देर हो या सवेर
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नहीं मिटेगा तो केवल
मकान के भीतर का शून्य आकाश
शून्यता तो पहले भी थी इन दीवारों में ,
और, ये बनी रहेगी हमेशा बाद तक में
घेर रखा था दीवारों ने शून्य को
तो अब तुम ही बताओ!!!!
कैसे दे दूँ मकां की संज्ञा ,.इन दीवारों को????
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रह सकता क्या कोई इन दीवारों में?
रहना तो संभव होता
सिर्फ खाली जगहों में
तभी तो इन्हें कहा जाता " स्पेस " अंग्रेजी में ,
जिन्हें होगा शून्य पर विश्वास ,
तभी होगा उनके अहं का नाश
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जब चेतना का होता 
सत्य से एकाकार ,
तो ही मिट पाता अहं का विकार
तब!!!!
तब, भीतर और बाहर की शून्य के " मिलन " में
हो ही जाते अहं पूर्णतः समाप्त

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