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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



कहाँ से लाऊं दिल मैं ऐसा

डॉ०अनिल चड्डा


कहाँ से लाऊं दिल मैं ऐसा 
जो सोचे न ऐसा-वैसा,
साथ चलो तो संगी मेरे,
नहीं तो फिर ये रिश्ता कैसा।

कौन पुकारे बिन मतलब के,
कौन यहाँ पर साथ निभाये,
जीवन की अंधी गलियों में, 
ऐसा कोई कहाँ मिल पाए,
यही सिखाया है राहों ने,
देना है जैसे को तैसा।
कहाँ से लाऊं…

यूँ तो सब पैसे पर मरते,
पाप यहाँ पर छुप कर करते,
जो है तेरा, सब मेरा है,
मुँह से राम-राम हैं जपते,
कौन है तेरा, कौन है मेरा,
सभी कुछ यहाँ है पैसा।
कहाँ से लाऊं…
 
अच्छे लोग कहाँ मिलते हैं,
मिलते बुरे घनेरे,
कौन सके पहचान भला,
यहाँ पे दोगले चेहरे,
कहते फिरते सभी यहाँ पर,
जहाँ में कौन है मेरे जैसा।
कहाँ से लाऊं….

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