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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय , 2018



अन्तर्मन


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


जादूगर पेड़ की छाया में बैठने के बाद चलते समय खुश होकर बोला - "हे वृक्षराज ! मांगो क्या मांगते हो ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हुआ हूँ, तुमने लम्बे सफर की थकान दूर की है |"

पेड़ ने कहा - "हे जादूगर! अगर कुछ दे सकते हो तो मुझे स्त्री रूप में रहने का कोई मन्त्र दे दो|"

"स्त्री..!"ठहाका लगा कर जादूगर हँस पड़ा|

"क्या हुआ जादूगर, तुम हँसे क्यों?"

"दिया मन्त्र मैंने ! तुम खुद उसमें ढलकर समझ जाओगे कि मैं क्यों हँसा |" कहकर जादूगर कुछ बुदबुदाया | सामने एक सुंदर स्त्री प्रगट हो गयी| दोनों को एक मन्त्र बताकर जादूगर ने हिदायत दी फिर वह हँसता हुआ वहां से चला गया |

पेड़ के बगल में ही खड़ी हुई पेड़ से प्रगट हुई स्त्री ने पूछा, “अब बताओ इस रूप में मैं ज्यादा काम की चीज और खूबसूरत हूँ या पेड़ रूप में थी?"

पेड़ बोला, “खूबसूरत तो मैं तुम्हारे रूप में ही हूँ, पर मेरी खूबसूरती भी कम नहीं | और काम का तो मैं तुमसे ज्यादा ही हूँ|”

"न! मैं हूँ ज्यादा उपयोगी|”

पेड़ ने कहा,"न, न मैं!”

"मैं नहीं मानती|"

पेड़ ने धौंस देते हुए कहा- “जब कभी लोग गर्मी से बेकल होते हैं, मुझे देखते ही सुस्ताने आ जाते हैं|”

“मुझे भी तो|” रहस्यमयी हँसी हँस कर स्त्री बोली| “मुझसे तो आदमी को छाया और अपार सुख मिलताहै|”

“अरे मूर्ख ! मैं भी छाया और सुख प्रदान करती हूँ | आंचल से ज्यादा छाया और सुख कोई नही दे सकता है|” अहंकार से भर स्त्री इठला पड़ी|

“मुझपर लगे फल लोग खा के तृप्त होते हैं|”

“हा हा हा हा” ठहाका मारकर स्त्री बोली, “मुझसे भी तृप्त ही होते हैं |” कहने के बाद स्त्री छुई-मुई सी शरमा गयी|

“लोग मेरी पतली-पतली शाखायें काटकर, आग जलाकर खाना बनाने और ताप लेने के काम में लाते हैं|”

“मैं स्वयं एक आग हूँ, बड़े बुजुर्ग यही कहते हैं |” कहते हुए रहस्यमयी मुस्कान बढ़ गयी थी उसकी|

“मैं आक्सीजन प्रदान करता हूँ|”

“मैं खुद आक्सीजन हूँ ! जिन्दगी देती हूँ ! मेरे से प्यार करने वाला मेरे बगैर मर जाता है | तुमसे भी प्यार करने वाले करते तो हैं, पर तुम्हारे न होने पर मरते नहीं हैं |” गर्वान्वित हो बोलीस्त्री|“मैंउपवनको हरा-भरा रखता हूँ |”

“अरे महामूर्ख , मैं खुद उपवन ही हूँ ! मेरे बगैर इस धरती का सारा वैभव तुच्छ है |”

“मुझे लोग काटकर निर्जीव कर अपने घरों में सजाने के उपयोग में लें आते हैं |” वृक्ष अचानक थोड़ा दुखी हो बोलकर शांत रहा |

उदास होकर फिर से वृक्ष बोला "इससे अच्छा है मैं तुम्हारे इस स्त्री रूप में ही रहूँ | सच में तुम ज्यादा खूबसूरत और काम की हो | मैंने हार मान ली तुमसे |”

यह सुनते ही स्त्री का अहंकार खो-सा गया | स्त्री बोली, “नहीं, नहीं वृक्षराज ! मैं इस रूप में नहीं रह सकती | तुम्हारा उपयोग निर्जीव रूप में ही सही, मानव शान से तो लोग कर रहे हैं, किन्तु मुझे तो न चैन से जीने देते हैं और न मरने ही | तुम्हे एक बार में काटकर निर्जीव करके फिर तुम्हारे ऊपर आरी चलाते हैं पर मुझ पर तो जीते जी |” दुखित हो स्त्री बोली |

"ठहरो, फिर से मैं तुम में समा जाती हूँ | जादूगर ने कहा था न कि सूरज डूबने से पहले नहीं समाई तो मैं स्त्री ही बनके रह जाऊँगी | हे वृक्षराज , मैं स्त्री नहीं, वृक्ष रूप में ही ज्यादा सुरक्षित हूँ | और हर तरह से मानव को सुख देने में सक्षम रहूंगी इसी वृक्ष रूप में | मानव स्त्री को तो नरक का द्वार कहकर घृणा भी करता है | तुम्हें यानि पीपल को पिता का रूप मान आदर देता है | मैं तुम्हारे रूप में ही रहकर सुकून पाऊँगी | हे वृक्षराज ! तुम मुझे अपने में समेट लो |” विनती करती हुई स्त्री रो पड़ी |

दोनों ने जादूगर द्वारा दिए मन्त्र बोले और एक रूप हो गये | अँधेरा अपने यौवन रूप में प्रवेश कर चुका था | लेकिन स्त्री अब अपने को सुरक्षित पाकर सुकून की साँस ले रही थी |


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