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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय , 2018



मिट्टी


राजीव कुमार


रह-रहकर राजू को अपने आंगन की मिट्टी की सुगंध उसकी मां की याद दिलाती रहती। जब राजू की मां जिंदा थी तो राजू के साथ मिलकर फूल का पौधा लगाया था। उस पौधे को गमले में लगाकर राजू अपने साथ विदेश ले आया था। जहां उसके पापा रामेश्वर भगत रहते थे। रामेश्वर भगत ने राजू का नामांकन पास के ही प्राइवेट स्कूल में करवा दिया। काम के समय भी उनका ध्यान राजू पर ही टिका रहता। एक महीना अपने पिता के साथ विदेश में गुजारने के बाद राजू का मन अचानक बेचैन हो गया।

राजू पिता से कहने लगा, ‘‘पिताजी, यहां मन नहीं लग रहा है। हमको अपने घर जाना है। दादी के पास, मनोहर काका के पास, अपने दोस्त रघू के पास।’’

रामेश्वर भगत ने बड़े प्यार से समझाने की कोशिश की, मगर नहीं मानने पर बुरी तरह से पीटा। रामेश्वर भगत को पछवावे के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगा। राजू उदास रहने लगा। गमले में पानी डालता तो उसको अहसास होता कि मां पास में खड़ी है और मुस्करा रही है।

एक दिन अचानक वो पौधा मुरझा गया। पानी-खाद देने के बाद भी कोई सुधार नहीं आया और पौधा मर गया। इसी के साथ राजू का चेहरा मुरझाने लगा, क्योंकि उस पौधे में मां नजर आती थी, उसके पत्ते मां का लहराता आंचल लगता था।

रामेश्वर ने राजू से पूछा, ‘‘आखिर क्या बात है, इतनी सुविधाओं के बावजूद भी तुम्हारा मन क्यों नहीं लग रहा है?’’

राजू ने बिलखते हुए कहा, ‘मां की निशानी वो पौधा मर गया। वहां से उखाड़ना ही नहीं चाहिए था। वो पौधा वहां की मिट्टी के लिए था। हमको भी मन नहीं लग रहा है।’’

रामेश्वर भगत राजू को लेकर अपने देश आ गए। यहां राजू का मुरझाया हुआ चेहरा दादी, काका, काकी और दोस्तों से मिलकर फिर से खिल उठा।


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