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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



चलते चलते...


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


     	   
भाव चुराते 
ताव चुराते

साहित्य समुंदर 
पार करन को
वो शब्दों की 
नाव चुराते

हाथ- सफाई
ऐसी करते
अच्छे-अच्छे
गच्चा खाते

सूरज-चंदा
छिपे ओट में
बादल अपना
रोब जमाते

कहीं से शब्द
कहीं से पंक्ति
भानुमता यूं
कविता बनाते

मंचों पर
छा जाते जैसे
आसमान पर
बादल छाते

चोर-चोर
मौसेरे भाई
अलग अपनी
बिसात जमाते

'व्यग्र' आज भी
व्यग्र है देखो
अच्छे दिन
उसके ना आते

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