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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



अनछुए पल


सौरभ “जयंत ”


     	
पल कुछ जीवन के अनछुए से रह गए,
सवाल कुछ जीवन के अनकहे ही रह गए,
रखी थी सहेज खुशियों जो मुठ्ठी भर- 
“उलझनों में बह गए”, 
उलझनों में हम पहचान तलाशते- 
“अंजान बन रह गए”
पल  जीवन के कुछ अनछुए से रह गए,
सवाल जीवन के कुछ सवाल ही रह गए,
तूफानों में घबराये नहीं, गम में भी न रोयेंगे,
हंसने की पर वजह ढूँढते-
 “मुस्कुराना भूल गए” 
सवाल जीवन के “कुछ” बस सवाल बन रह गए,
पल कुछ जीवन के “यूँ “ अनछुए ही  रह गए।।
  

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