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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



इंसान पेड़ नहीं बन सकता


रश्‍मि शर्मा


     
पेड़ अपने बदन से 
गिरा देता है 
एक-एक कर सारी पत्तियाँ
फिर खड़ा रहता है 
निस्संग
सब छोड़ देने का अपना सुख है
जैसे
इंसान छोड़ता जाता है
पुराने रिश्ते-नाते
तोड़ कर निकल आता है
उन तन्तुओं को
जिनके उगने, फलने, फूलने
तक
जीवन के कई-कई वर्ष ख़र्च
किए थे
पर आना पड़ता है बाहर
कई बार ठूँठ की तरह भी
जीना होता है
मोह के धागे खोलना
बड़ा कठिन है
उससे भी अधिक मुश्किल है
एक एक कर
सभी उम्मीदों और आदतों को
त्यागना
समय के साथ
उग आती है नन्हीं कोंपलें
पेड़ हरा-भरा हो जाता है
पर आदमी का मन
उर्वर नहीं ऐसा
भीतर की खरोंचे
ताज़ा लगती है हमेशा
इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी।
 

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