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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



आषाढ़ की सांझ


रश्‍मि शर्मा


     
दुनि‍या के चि‍तेरे ने
कूची से अपने
रंग दि‍या
आसमान को
कहीं गाढ़ा नीला
तो कहीं है
बदरंग सा धब्‍बा
उस नीले आसमान की
छाती पर
टंगा है आज
पीला उदास चांद
अपनी मरि‍यल
रौशनी के साथ
आषाढ़ की बूंदों को तो
नि‍गल लि‍या
सूरज के प्रखर
ताप ने
अब ढलती रात को
काले बादलों का ग्रास
बन गया है पीला चांद
क्‍या अबकी सावन
बरसेगा झमाझम
ऐ पीले चांद
तुम न आना आज
आसमान पर
कहीं ऐसा न हो कि
सावन रूठ जाए.
 

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