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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



माँ की जरा भी तखलीफ


रामदयाल रोहज


    
माँ की जरा भी तखलीफ
नहीं सह सकती है बेटियाँ
पराई हो गई है
फिर भी पराई नहीं
जब सूरज आग बबूला होकर
उगलता है आग की लपटें
पत्थर भी झुलसने लगते है
पानी डरकर छुपने लगता है
अपना रूप बदलकर तो
धरती मां पर आफत आई देख
ये बेटियां कमर कस लेती है
लिपट जाती है उसकी छाती से
बचा लेती अपनी मां को
श्वेत नीली पीली लाल गुलाबी
नन्ही नन्ही छतरियाँ तानकर
एक बार घमंडी बादलों ने बेवजह
बर्फ के गोलों से प्रहार किए
तब भी ये बेटियाँ माँ पर गिर गई
अपनी पीठ पर सहती रही चोटें
इतना रक्त निकल कर गिरा
माँ की छाती भीग गई
बेटियों का शरीर भी हो चुका ठंड़ा
सब अपने काम में व्यस्त
लेकिन मेड़ पर बैठा एक आदमी
चुपचाप आँसू गिरा रहा था लगातार
इन हरी लाशों पर |
 

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