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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



शब्दांजलि


पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'


   
संघर्षों की अमर कहानी,जीने वाले नायक थे।
लक्ष्य भेद तक नहीं रुके जो,ऐसे अचूक सायक थे।
सदन द्विवेदी सम्पन्न बड़ा,सकल गाँव में न्यारा था।
दीन-उपेक्षित-विकल मनुज जो,उनका एक सहारा था।।
               ऐसे घर में जन्म लिए वो,नाम रमाशंकर जिनका।
           अति सौम्य सुशील सदाचारी,सानी रहा नहीं तन का।
                नियति नटी ने खेल रचाया,पिता छत्रछाया छूटी।
                मानस अनंत विश्वास भरा,नहीं डोर आशा टूटी।।
निज बल-पौरुष-ज्ञान-कर्म से,पायी खूब प्रतिष्ठा थी।
संत-सनातन धर्म रीति पर,उनकी अनन्य निष्ठा थी।
पीठ जमुनिया पर जब बैठें,वस्त्र पहनकर खद्दर के।
भूषित भूषण भव्य देह पर,वासी होते हर उर के।।
           कीर्ति कमाई वैद्य बने जो,मृतकों को करके जीवित।
               मुफ्त दवाएँ बाँट-बाँटकर,पा लेते पुण्य असीमित।
                मल्लयुद्ध के योद्धा अनुपम,चौहद्दी में जोड़ नहीं।
                  हार सामने वाला जाए,दाँवपेंच का तोड़ नहीं।।
मानव सेवा में हृदय रमा,शंकर से उपकारी थे।
अंत समय तक स्वाभिमान से,जीने के अधिकारी थे।
प्रकृति प्रदत्त घोर कष्टों को,हँसते-हँसते झेल गए।
दुःख रूपी ऊँचे पर्वत को,नाना स्वयं धकेल गए।।
              गए छोड़कर सत्कर्मों की,अपनी अक्षत थाती को।
                    आशीष सदा देते रहना,अपने प्यारे नाती को।
             शब्द आपसे मुझे मिले हैं,और दान इस जीवन का।
             भावपूर्ण शब्दांजलि देकर, 'पूतू' यश गाए उनका।।
     अंत मई का आठ दस,और दिवस गुरुवार।
        छः बजकर पैतीस पर,छोड़ गए संसार।।
 

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