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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



जीवन का मर्म


पीताम्बर दास सराफ"रंक"


   
जीवन के बस दो ही दिन हैं
इक जनम का,इक मरण का ।
जीवन मरण के बीच में तू
इक मोहरा है उसके हाथों
वो जैसा चाहे तुझे चलाये
तेरीे चालें उसके हाथों
जीवन के बस दो पहलू हैं
इक धरम का,इक करम का।।१।।
नाचेगा तू डमरू पे उसके
बोलेगा तू उसकी बोली
वो बोलेगा खड़े रह यहाँं 
कह न पाएगा अपनी रोनी
जीवन के बस दो संकट हैं
इक रहने का,इक जाने का।।२।।
कुछ न करेगा उसके आगे
हाथ जोड़ कर खड़ा रहेगा
वो जितना दे उसके आगे
कौड़ी अधिक नहीं पायेगा
जीवन के बस दो ही सच हैं
इक करनी का, इक भरनी का।।३।।
उसे पता है तुझसे ही तो
उसका अस्तित्व बना हुआ है
तू है तो वो भी है जग में
तुझमें ही वह बसा हुआ है
जीवन के बस दो घमंड हैं
उसे साधने का,तुझे पालने का।।४।।
 

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