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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



वो सितमगर है


विज्ञान व्रत


     	
वो   सितमगर    है   तो   है 
अब  मेरा  सर   है   तो    है 

आप   भी   हैं    मैं  भी   हूँ
अब  जो  बेहतर  है  तो  है 

जो   हमारे    दिल   में   था 
अब   ज़बाँ  पर   है  तो   है 

दुश्मनों     की     राह     में
है   मेरा    घर    है   तो   है 

एक   सच    है    मौत   भी 
वो    सिकन्दर    है   तो   है 

पूजता     हूँ       बस    उसे 
अब  वो   पत्थर  है  तो   है 

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