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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



किस्मत का खेल


नरेंद्र श्रीवास्तव


     	
कहीं खुली हवा ,कहीं लगे कि जेल है।
भाई!ये है इम्तिहाँ ,पास है कि फेल है।।

ठहाके उधर गूँजे, इधर कोई  रो रहे।
भाई ! ये तो सब, पैसों की झेल है।।

फूल महके उधर,इधर के मुरझा रहे।
भाई! ये  तो  मौसम की  बेल  है।।

रुख़सार गीले उधर,इधर प्यासे अधर।
भाई! ये  तो  दिल  जुड़े  की मेल है।।

उधर भारी भीड़, इधर डिब्बा खाली।
भाई! ये  तो  जिंदगी  की  रेल  है।।

गड़ा धन मिला उधर,श्रम धन गुमा इधर।
भाई!  ये  तो  किस्मत  का  खेल  है।। 

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