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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



बरखा आई,बरखा आई


डॉ. प्रमोद सोनवानी पुष्प


     	 
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई ।
जहां -  तहां  हरियाली  छाई  ।।

हुए लबालब ताल - तलैया ।
डुबकी  खूब  लगा लो भैया ।।

टर-टर मेंढक, झींगर झिन-झिन ।
नाच रहे हैं ताक-धिना-धिन ।।

ठंडी - ठंडी  ले  पुरवाई  ।
बरखा आई , बरखा  आई ।।

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