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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



"जीवन"


डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण"


 		 
 
अनादि काल से जीवन की गुत्थी को सब सुलझाने में लगे रहे हैं,लेकिन ये गुत्थी तो सुलझने का नाम ही नहीं लेती।मेरी भी तो कई उलझनें
हैं, जिन्हें सुलझाने का प्रयास मैं करता आया हूँ।माँ शारदा से जब माँगता हूँ,तो वे कृपा करके कुछ बिंदु दे देती हैं, जिन्हें मैं शब्दों में ढाल
देता हूँ।आज भी एक गीत माँ ने दिया है,जो मैं आप सबको अर्पित करता हूँ।
-डॉ "अरुण"
"जीवन" ये जीवन तो है गोरखधंधा, देखभाल कर चलना प्यारे। नियति नचाती सारे जग को, आँखे फिर भी खुलें कहाँ? बार-बार मन वहीँ घूमता, मेला रंगों का सजा जहाँ।। सारे ही रंग लुभाते जग को, सच में तो सब छलना प्यारे। कौन सगा और कौन पराया, उलझन में खोया है मन। सार ढूँढता मन का यह पंछी, बीत रहा हीरे सा जीवन।। उलझन कैसे सुलझे जग की, सबको सांचों में ढलना प्यारे। छूटेगा जब मोह इधर का, उस का रंग तभी भाएगा। जिस पल जानेंगे सच्चाई, तत्व तभी तो मिल पाएगा। धरती में जैसा बीज डलेगा, बस वैसा ही तो फलना प्यारे।

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