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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



लड़कियां जब.....


रजनी कुमारी


 		 
लड़कियां जब डूबती है प्यार में
वह अकेले होकर भी 
कभी नही रहती अकेली
जलाशयों की भांति ठ़हरा उनका मन
पाना चाहता है नदी सी तरलता...
वह खोल देना चाहती है 
अपने मन का हर कोना
जो जाने कब से कैद था
स्वंय द्वारा निर्मित कारावास में...
वह मुस्कुराती है मन की मन
बात-बेबात चहकती खिलखिलाती है 
हजार दफ़ा खुद को आईने मे निहार
गुनगुनाती है प्रेम राग...
संजोय हुए पलों को याद कर
झुका लेती है शर्म से नज़रे
नित नए-नए उदाहरणों से 
देती है अपने प्रेम को परिभाषा...
खूले आकाश मे उड़ती है बेखोफ़
और प्रेम की डोर से
नाप लेना चाहती है सारा आसमां..

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