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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



डोर


मंजूषा मन


 		 
वो एक डोर
जिसका एक सिरा तुम्हारे हाथ में था
और दूसरा 
जकड़ा हुआ था मेरे हाथों में...

अफसोस...
हम अलग अलग दिशाओं में चले,
चलते रहे
कुछ दूर तुम घसीट ले गए मुझे
कुछ दूर मैने भी तुम्हे खींचा...

इस खींच तान में
टूट गई डोर
जिसका एक सिरा
आज भी बंधा है मेरे हाथों में,

लाख कोशिशों के बाद भी
नहीं मिल पाई निज़ात
इस टूटी हुई डोर से...

क्या यही प्रेम डोर थी।

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