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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



खोजने चली जो जिन्दगी को


गीता धीमान 'आभा '


 		 
खोजने चली जो जिन्दगी को
आया  न कुछ हाथ मेरे
परतें ही परतें
जितनी भी उधेड़ी मैंने
उतने ही पाए शून्य के घेरे ,
ज्यों छिलके हों प्याज के
या वायु के थपेड़े ,
शून्यता को संग लिए
वृथा ही नामों से घिरे !
न सार है न तत्व है
न मूल्य है न सम्पदा ,
बस रेत ही रेत है 
जो बन्द मुट्ठी में
रोकने की चेष्टा में
खिसकती खिसकती ही रही
और बन्द खाली मुट्ठी लिए मैं
सिसकती ही रही ,सिसकती ही रही !

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