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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



उड़ जाना


अशोक बाबू माहौर


 		 
पेड़ घर में 
आँगन में 
खड़ा 
सीना तान 
उस पर बैठे पंछी हजार 
तोता मैना 
गौरैया 
और कोयल काली 
धम्म नीचे गिरी गौरैया 
फरफराती पर 
उत्सुक निगाहें टटोलती 
मैंने उसे दबोचा 
कहा-'गौरैया फुदक जरा 
आँगन में 
फिर उड़ जाना '
गौरैया उदास 
हिलाने लगी पर 
किन्तु कहाँ था ?
आँगन खुला 
न घास की फुलझड़ियाँ
न कच्ची दीवाल 
गौरैया फुर्र उड़ गई 
सपने दे गई  

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